मेघाका मन मुस्काये रे!
नीलगगनके इंद्रधनुषमें जागा सूरज गाये रे!
शाम ढले तो चंदा गाये मेघाका मन मुस्काये रे!
बरसों से यह आंखे केसी जमकर जाने बर्फ़ बनी थी;
बुंदे बनकर बरसा जब मै, खुद ही खुदको पाये रे!
साकी महेफिल छोड गया तो बरखामै भी प्यासे भट्क़े,
खुदही अपना जाम भरा अब मयखाना भी छलकाये रे!
सूने सीमित संवेदनमें भी हर फुल फुल म्हेकाये रे!
एक परींदा उडता जाये तारों के तन पर छाये रे!
नाचें अब ये आठ दिशायें, सुर ये हर बुंदो से गाये!
हमनेभी एक राग चुना है, मेघाका मन मन मुस्काये रे!
- तेजस शाह
26-11-2011



