मेघाका मन मुस्काये रे!
नीलगगनके इंद्रधनुषमें जागा सूरज गाये रे!
शाम ढले तो चंदा गाये मेघाका मन मुस्काये रे!
बरसों से यह आंखे केसी जमकर जाने बर्फ़ बनी थी;
बुंदे बनकर बरसा जब मै, खुद ही खुदको पाये रे!
साकी महेफिल छोड गया तो बरखामै भी प्यासे भट्क़े,
खुदही अपना जाम भरा अब मयखाना भी छलकाये रे!
सूने सीमित संवेदनमें भी हर फुल फुल म्हेकाये रे!
एक परींदा उडता जाये तारों के तन पर छाये रे!
नाचें अब ये आठ दिशायें, सुर ये हर बुंदो से गाये!
हमनेभी एक राग चुना है, मेघाका मन मन मुस्काये रे!
- तेजस शाह
26-11-2011

November 26, 2011 at 11:03 pm
सूने सीमित संवेदनमें भी हर फुल फुल म्हेकाये रे!
एक परींदा उडता जाये तारों के तन पर छाये रे!
नाचें अब ये आठ दिशायें, सुर ये हर बुंदो से गाये!
हमनेभी एक राग चुना है, मेघाका मन मन मुस्काये रे!
क्या बात है !
बढ़िया प्रस्तुति
अब सोचना यह है कि मेघ जाति का मेघ नाम क्यों रखा गया? क्या यह कर्म पर या किसी और कारण से रखा गया? मनुष्य द्वारा बनाई गई भाषा के अनुसार मेघ एक गायन विद्या का राग भी है, जिसे मेघ राग कहते हैं. मेघ बादल को भी कहते हैं.
January 3, 2012 at 4:27 am
very nice …like ur all poems